मनेन्द्रगढ़। संबोधन साहित्य एवं कला विकास संस्थान ने अपनी 50 वर्षों की गौरवशाली यात्रा में साहित्य, कला, पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था ने न केवल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहचान दिलाई, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण तथा विकास से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया। संस्थान की इस स्वर्णिम यात्रा के उपलक्ष्य में विजय नर्सरी विद्यालय परिसर में वैचारिक संगोष्ठी एवं कविता-गीत उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें वरिष्ठ साहित्यकारों, संस्था के सदस्यों और नगर के प्रबुद्ध नागरिकों ने अपने विचार साझा किए।
चंदनवन से फॉसिल पार्क तक, विकास के मुद्दों को दी नई दिशा
संगोष्ठी में संस्था के संस्थापक सदस्य वीरेंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि संबोधन साहित्य एवं कला विकास संस्थान ने अपने पांच दशकों के सफर में कई ऐतिहासिक उपलब्धियों से जुड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के एकमात्र 250 एकड़ क्षेत्र में विकसित मलयागिरी चंदनवन, नर्मदा को बचाने के लिए बॉक्साइट उत्खनन पर रोक लगाने की पहल, लगभग 29 करोड़ वर्ष प्राचीन गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क के विकास तथा नागपुर-चिरमिरी रेल लाइन की स्वीकृति जैसे महत्वपूर्ण विषयों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि मनेन्द्रगढ़ रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार पर समुद्री जीवाश्म देखने के लिए यहां उतरने का संदेश देने वाला बोर्ड और गोंडवाना फॉसिल पार्क के प्रवेश द्वार पर लगा आभार बोर्ड संस्था के योगदान के साक्ष्य हैं। इन पहलों ने क्षेत्र की प्राकृतिक धरोहर, पर्यटन और विकास संबंधी विषयों को व्यापक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रतिभाओं को सम्मानित करने की परंपरा बनी पहचान
संस्था के उपाध्यक्ष पुष्कर तिवारी ने कहा कि संबोधन की पहचान केवल साहित्यिक आयोजनों तक सीमित नहीं रही है। संस्था ने छात्र प्रतिभा सम्मान समारोह के माध्यम से विद्यार्थियों को स्वर्ण एवं रजत पदक प्रदान कर उनकी प्रतिभा को प्रोत्साहित करने की गौरवशाली परंपरा विकसित की है। इस पहल से प्रेरित होकर समाज की अन्य संस्थाएं भी प्रतिभाओं के सम्मान की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1998 से संस्था द्वारा पुष्प-पौध प्रदर्शनी एवं प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य आम नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण, पौधरोपण और गृह वाटिका के प्रति रुचि विकसित करना रहा है।

सामूहिक प्रयास और एकजुटता ही संस्था की ताकत
संगोष्ठी में वीरांगना श्रीवास्तव ने कहा कि साहित्यकार वीरेंद्र श्रीवास्तव के पर्यटन विषयक वैचारिक लेखों ने क्षेत्रीय पर्यटन को नई दिशा देने में योगदान दिया और उन्हें संस्था से जुड़ने की प्रेरणा मिली।
अधिवक्ता कल्याण केसरी ने कहा कि साहित्य एवं कला के विकास के लिए संस्था के सदस्यों के सामूहिक प्रयास और एकजुटता इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं। पांच दशकों में संस्था ने नाट्य मंचन, साहित्य, पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण, संगीत और कला के क्षेत्र में अनेक आयोजन कर कलाकारों को मंच प्रदान किया है। इसके चलते संबोधन ने अंचल में अपनी अलग पहचान और विश्वसनीयता स्थापित की है।
इस अवसर पर वरिष्ठ नागरिक सत्यनारायण सहित अन्य नागरिकों ने भी संस्था की गतिविधियों और उपलब्धियों पर अपने विचार व्यक्त किए।
कविता और गीतों ने बांधा समां, रचनाओं ने उठाए सामाजिक सवाल
कार्यक्रम के दूसरे चरण में आयोजित कविता एवं गीत उत्सव में रचनाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को भावविभोर किया। रामचरित द्विवेदी ने संस्था की 50 वर्षों की यात्रा को समर्पित गीत प्रस्तुत किया, जिसकी पंक्तियों ने सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंजा दी।
गीत में उन्होंने संबोधन की उपलब्धियों और गौरवपूर्ण यात्रा को शब्द देते हुए कहा—
“छत्तीसगढ़ साहित्य जगत में नित्य नए सिद्धांत गढ़े,

50 वर्ष में संबोधन ने गौरव के कई शिखर चढ़े।
हर विकास की परिभाषा में बच्चों का भोलापन है,
अर्धशताब्दी उम्र में देखो पहुंच रहा संबोधन है।”
युवा रचनाकार उज्ज्वल सिंह ने अपनी कविता के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्शों और उनके चरित्र को जीवन में उतारने की आवश्यकता पर सवाल उठाए। उनकी पंक्तियों ने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया—
“राम सरल हैं, पर उनका पथ चलना बहुत कठिन है,
‘जय श्रीराम’ के नारे केवल क्या उनकी मंजिल हैं?
मूर्ति बनाकर उनको हमने मंदिर में क्यों कैद किया,
क्या उनके चरित्र का पालन इतना भी मुश्किल है?”
वृद्धाश्रम विषय पर ज्योति मजूमदार की कविता ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। माता-पिता के त्याग और वृद्धावस्था में उनके प्रति संतानों के दायित्व को रेखांकित करती उनकी पंक्तियों ने सामाजिक संवेदनाओं को झकझोरा—
“जिसे बनाने डॉक्टर-इंजीनियर अपना पूरा जीवन लगाया है,
आज वही बेटा मां को वृद्धाश्रम में छोड़ के आया है।”
नई पीढ़ी की रचनाकार इशिता सिंह ने हिंदी भाषा की स्थिति और उसके विकास से जुड़े सवालों को अपनी कविता में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा—

“भारत में जन्मी हिंदी आज विदेश में पल रही है,
अपने ही देश में देखो लंगड़ा कर चल रही है।”
पुष्कर तिवारी ने अपनी हास्य रचनाओं से मंच पर ठहाके बिखेरे, वहीं श्याम सुंदर निगम की सजल प्रस्तुति ने श्रोताओं को प्रभावित किया। वीरांगना श्रीवास्तव, संस्था अध्यक्ष अनिल जैन, वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, कल्याण केसरी और विजय गुप्ता की मोबाइल कविताओं को भी श्रोताओं ने सराहा।
नई पीढ़ी के कंधों पर शताब्दी वर्ष तक पहुंचाने की जिम्मेदारी
कार्यक्रम की अध्यक्षता अनिल जैन ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में इंदिरा सेंगर उपस्थित रहीं। शाम पांच बजे से शुरू हुए कार्यक्रम का संचालन युवा प्रतिभा इशिता सिंह ने किया। उनके प्रभावी संचालन ने संगोष्ठी और कविता-गीत उत्सव को जीवंत बनाए रखा।
समापन अवसर पर संस्था की संरक्षक इंदिरा सेंगर ने कहा कि संबोधन की 50 वर्षों की यात्रा साहित्य, कला, पर्यटन और पर्यावरण के विकास के लिए किए गए निरंतर प्रयासों और संघर्षों की यात्रा है। अब संस्था को शताब्दी वर्ष तक पहुंचाने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी के कंधों पर है। उन्हें विश्वास है कि युवा पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए संस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।
कार्यक्रम में अधिवक्ता श्याम बिहारी रैकवार, कल्याण चंद केसरी, नरेंद्र श्रीवास्तव, वीरांगना श्रीवास्तव, उज्ज्वल सिंह, राशिद कुरैशी, सतिया महाराज, विजय गुप्ता, पत्रकार विनय पांडे, राजेश सिन्हा और रामचरित द्विवेदी सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
संबोधन साहित्य एवं कला विकास संस्थान की स्वर्णिम यात्रा का यह आयोजन साहित्यिक उपलब्धियों के स्मरण के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों, सांस्कृतिक चेतना और नई पीढ़ी को रचनात्मक दिशा देने के संकल्प का भी प्रतीक बना।
