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मौत के 42 दिन बाद मृत आरक्षक के मोबाइल पर आया संदेश—“आप स्वस्थ होकर घर जा रहे हैं”: मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड पर उठे गंभीर सवाल

अस्पताल ने 30 जून को जारी किया था मृत्यु प्रमाणपत्र, फिर सरकारी सिस्टम में कैसे चलता रहा इलाज? आयुष्मान योजना के रिकॉर्ड को लेकर जांच की मांग

रिपोर्टर: सुरेंद्र मिनोचा

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Aug 11, 20265 min read83 views
मौत के 42 दिन बाद मृत आरक्षक के मोबाइल पर आया संदेश—“आप स्वस्थ होकर घर जा रहे हैं”: मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड पर उठे गंभीर सवाल

अंबिकापुर। शासकीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर से सामने आया एक मामला सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के डिजिटल रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच गंभीर विरोधाभास की ओर इशारा कर रहा है। जिस मरीज की 30 जून को मृत्यु हो चुकी थी और अस्पताल द्वारा मृत्यु प्रमाणपत्र भी जारी किया जा चुका था, उसके मोबाइल फोन पर करीब 42 दिन बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से संदेश पहुंचा—“प्रिय देवनारायण राम, हमें खुशी है कि आप स्वस्थ होकर घर जा रहे हैं।”

इस संदेश के सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मरीज की मृत्यु 30 जून को हो चुकी थी, तो स्वास्थ्य विभाग के सिस्टम में करीब डेढ़ महीने बाद तक वह इलाजरत कैसे दिखाई देता रहा? क्या यह महज तकनीकी अथवा डाटा अपडेट की त्रुटि है, या फिर अस्पताल और आयुष्मान योजना के रिकॉर्ड के बीच किसी गंभीर लापरवाही की वजह से ऐसा हुआ? इन तमाम बिंदुओं की जांच अब महत्वपूर्ण हो गई है।

30 जून को हो चुकी थी मौत, अस्पताल ने जारी किया मृत्यु प्रमाणपत्र

मामला जशपुर जिले के कटंगखार निवासी आरक्षक देवनारायण राम से जुड़ा है। बताया गया कि उनका उपचार अंबिकापुर स्थित शासकीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चल रहा था। परिजनों के अनुसार अस्पताल में भर्ती होने के करीब चार दिन बाद 30 जून को उनकी मृत्यु हो गई। अस्पताल की ओर से मृत्यु प्रमाणपत्र भी जारी किया गया।

परिवार के लिए इसके बाद स्वाभाविक रूप से उपचार संबंधी प्रक्रिया समाप्त हो गई थी। लेकिन करीब 42 दिन बाद मृतक के मोबाइल नंबर पर आया स्वास्थ्य विभाग का संदेश पूरे मामले को एक अलग ही सवाल के घेरे में ले आया।

संदेश में मरीज के स्वस्थ होकर घर जाने की बात कही गई थी। इस संदेश को देखकर परिजनों के सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि आखिर सरकारी स्वास्थ्य रिकॉर्ड में मरीज की वास्तविक स्थिति क्या दर्ज थी।

मृत्यु प्रमाणपत्र एक तरफ, सिस्टम में इलाज दूसरी तरफ!

मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि एक ओर अस्पताल के रिकॉर्ड में मरीज की मृत्यु दर्ज होने की बात सामने आ रही है, जबकि दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग के डिजिटल सिस्टम से जारी संदेश में उसे स्वस्थ होकर घर जाने वाला मरीज बताया गया।

यदि यह केवल तकनीकी त्रुटि है तो यह जानना जरूरी है कि मृत्यु के 42 दिन बाद मृतक के मोबाइल नंबर पर उसी उपचार से संबंधित संदेश किस आधार पर भेजा गया। वहीं, यदि अस्पताल के रिकॉर्ड और आयुष्मान योजना के पोर्टल पर मरीज की स्थिति अलग-अलग दर्ज थी, तो दोनों प्रणालियों के बीच समन्वय की व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

आयुष्मान योजना के रिकॉर्ड को लेकर भी उठे सवाल

मृतक की पत्नी सीमा कुजूर, जो इसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में स्टाफ नर्स के पद पर कार्यरत हैं, ने आरोप लगाया है कि उनके पति की मृत्यु के बावजूद आयुष्मान योजना से संबंधित दस्तावेजों में उन्हें कथित तौर पर लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती दिखाया गया।

हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। लेकिन यदि मरीज की मृत्यु के बाद भी अस्पताल में भर्ती और उपचार की अवधि रिकॉर्ड में आगे बढ़ी है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होगा।

जांच के दायरे में आने वाले कई अहम सवाल

पूरे मामले में अब जांच एजेंसी अथवा अस्पताल प्रबंधन के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं

30 जून को मृत्यु के बाद मरीज का रिकॉर्ड सिस्टम में किस स्थिति में दर्ज था?

मृतक के मोबाइल नंबर पर 42 दिन बाद स्वास्थ्य संबंधी संदेश किस सिस्टम से और किस प्रक्रिया के तहत भेजा गया?

क्या आयुष्मान पोर्टल पर मरीज की डिस्चार्ज अथवा मृत्यु संबंधी जानकारी समय पर अपडेट की गई थी?

यदि मरीज की मृत्यु के बाद भी उपचार अवधि दर्ज हुई, तो उसे किस स्तर से अपडेट किया गया?

क्या मृतक के नाम पर उपचार संबंधी कोई अतिरिक्त प्रविष्टि या दावा दर्ज हुआ?

यदि कोई आयुष्मान क्लेम प्रस्तुत अथवा स्वीकृत हुआ है, तो उसकी वास्तविक स्थिति क्या है?

अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड, आयुष्मान पोर्टल और स्वास्थ्य विभाग के डिजिटल मैसेजिंग सिस्टम में समन्वय की क्या व्यवस्था है?

इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

अस्पताल प्रबंधन ने जांच की बात कही

मामला सामने आने के बाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन ने जांच कराने की बात कही है। मेडिकल कॉलेज अंबिकापुर के डीन डॉ. अविनाश मेश्राम के अनुसार आयुष्मान योजना के तहत उपचार और क्लेम की प्रक्रिया शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती है। इस मामले में गलती किस स्तर पर हुई और मृत मरीज के मोबाइल नंबर पर 42 दिन बाद स्वास्थ्य विभाग का संदेश कैसे पहुंचा, इसकी जांच की जाएगी।

अब निगाहें जांच पर टिकी हैं। यदि यह तकनीकी या डाटा एंट्री संबंधी त्रुटि है तो उसकी जिम्मेदारी और सुधार की प्रक्रिया भी सामने आनी चाहिए। वहीं यदि रिकॉर्ड में मृत्यु के बाद भी उपचार जारी दिखाने जैसी कोई अनियमितता सामने आती है, तो उसकी पूरी पड़ताल कर जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—जब अस्पताल के रिकॉर्ड में देवनारायण राम की 30 जून को मृत्यु हो चुकी थी, तो 42 दिन बाद सरकारी डिजिटल सिस्टम उन्हें “स्वस्थ होकर घर जाने वाला मरीज” क्यों कहे?

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